हिंदी है माथे की बिंदी,
हिंदी मन का मान,
इसमें मेरी मिट्टी महके,
इसमें हिंदुस्तान।
माँ ने जब पहली बार पुकारा,
हिंदी थी वह बोल,
आज भी उसकी मीठी धुन से
मन उठता है डोल।
दादी की वह कथा पुरानी,
पिता का मीठा प्यार,
घर-आँगन की हर आवाज़ में
हिंदी का संसार।
यह केवल अक्षर नहीं हैं,
जीवन की पहचान,
इसमें रोना, इसमें हँसना,
इसमें अपने प्राण।
चौदह सितंबर कहता है—
भाषा का रखो मान,
अपनी जड़ों से जुड़े रहो तुम,
यही देश की शान।
दुनिया की हर भाषा सीखो,
ज्ञान जहाँ से पाओ,
पर अपनी हिंदी को दिल से
कभी नहीं बिसराओ।
हिंदी का सम्मान तभी है,
जब व्यवहार में आए,
घर से लेकर विद्यालय तक
हिंदी मुस्काए।
एक दिवस से क्या होगा जब
दिल में प्यार न हो,
हिंदी अपने जीवन में हो,
बस इतना उपहार हो।
माथे की बिंदी बनी रहे यह,
जब तक रहे जहान,
मेरी भाषा, मेरी हिंदी—
मेरा गौरव, मेरी शान।
~जीतेन्द्र गिरि गोस्वामी “जीत” छत्तीसगढ़






