दुस्तर तम में डूबे जन को,
ज्योतित कर दे दो।
थका भ्रमित मन-पांखी मेरा
नव गति नव पर दे दो।
शक्ति-दर्प से जब मैं भरा था,
तुम्हें न मैंने तब सुमिरा था।
दर्प हुआ अब खंडित-खंडित,
निरवलंब मन विकल व्यथित,
आर्त ,क्लांत,एकाकी मुझको,
प्रिय !अवलंबन दृढ़ दे दो।
करूँ याचना किससे जाकर,
तू अपार करुणा का सागर,
ताप सघन मेरे अंतर में,
हाहाकार गर्जन है उर में,
व्यथा-चपला चंचल प्रतिपल ,
रस जल-कण दे दो।
पतझर वीरानों से मैंने,
तृप्ति-मधु की आस लगाई।
बधिर कर्ण को कातर स्वर में,
अपनी करूणा-कथा सुनाई।
बिनकहे मम मन की जानो,
मुस्कान मधुर दे दो।
चातक स्वाति-कण बिन प्यासा,
प्राण-पपीहे का स्वर छूटा।
आस भरा हर एक किनारा
मुझ मूरख ,अज्ञानी से रूठा,
गति अवरूद्ध ,पंथ दुर्गम है,
द्रवित दयामय ,भटके जन को,
विश्वास अमर दे दो।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली






