हर बार मौजूद रही मैं
जिन रिश्तों की खातिर,
वक्त आने पर उन्होंने
मुझे अनदेखा कर दिया।
हंसी के पीछे के दर्द को
जब दिल ने महसूस किया,
आगे बढ़कर सहारा दिया
उन्होंने ही मुझे अनदेखा कर दिया।
जिनको हमेशा अपना माना
दुख में जिनका सहारा बनी,
मेरे दर्द से भरे पलों में उन्होंने
मुझे अनदेखा कर दिया।
अब ना किसी से शिकायत है
ना कोई उम्मीद बाकी है,
जिनकी कद्र की मैंने जिंदगी में
उन्होंने मुझे अनदेखा कर दिया।
अब मौन हो चली हूं मैं
किसी से कोई उम्मीद नहीं,
जिनकी ताकत बनकर खड़ी थी
उन्होंने मुझे अनदेखा कर दिया।
सौ, भावना मोहन विधानी ✍️
अमरावती महाराष्ट्र।






