डाक्टर साहब रहम कीजिये

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मैंने डाक्टर साहब से पूछा,

मजबूर आदमी

जब अस्पताल आता है

उसके हालातों को देखकर भी

 

इतना लम्बा-चौड़ा

बिल बना दिया जाता है

 

कुछ रहम कीजिये

उससे मुफ्त में दुआ लीजिए

 

डाक्टर की आत्मा बोल पड़ी,

इतनी ना लूं

अस्पताल कैसे चलेगा ?

 

मेरी भी आत्मा फट गयी

डाक्टर साहब !

 

आपके पास कई बंगले

ढेर सारी लक्जरी गाड़ियां

सैकड़ों जगह जमीनें

 

ये सब आसमान से टपके हैं क्या?

इनकी भोली सूरत

एक बार निहार लिया कीजिये

 

थोड़ा रहम खाकर

हिसाब वाजिब बनाया कीजिये

 

और सच्चे जीवन को

सच्चा बनाइये

 

जयचन्द प्रजापति ‘जय’

प्रयागराज

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